कहीं ज़ुल्मतों में!

कहीं ज़ुल्मतों में घिर कर है तलाश-ए-दश्त-ए-रहबर,

कहीं जगमगा उठी हैं मिरे नक़्श-ए-पा से राहें|

मजरूह सुल्तानपुरी

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