दुनिया में बहुत किस्म के लोग हैं, सबकी अपनी-अपनी विशेषताएं और कमियाँ हो सकती हैं, जिनके आधार पर विद्वान लोग उनको वर्गीकृत कर सकते हैं| मैं विद्वान नहीं हूँ, विद्वान कहलाना मेरा लक्ष्य भी नहीं है, अतः मैं ऐसा कोई प्रयास नहीं करूंगा|

मुझे एक प्रसंग याद आता है, गोस्वामी तुलसीदास जी से जुड़ा हुआ, जिसमें कहा जाता है कि गोस्वामी जी द्वारा रचित श्रीरामचरित मानस को विद्वान लोग सबसे नीचे रख देते थे लेकिन वो सबसे ऊपर आ जाता था|
गोस्वामी तुलसीदास जी विद्वान नहीं थे, विद्वान लोग ज्ञानकोष लिखते हैं, तुलसीदास जी ‘विनय पत्रिका’ लिखते हैं| तुलसीदास जी का दर्शन निम्न पंक्तियों में भी अभिव्यक्त होता है-
देखत ही हरषे नहीं, नैनन नहीं सनेह,
तुलसी वहाँ न जाइए, कंचन बरसे मेह|
मेरा ऐसा मानना है कि ज्ञानमार्गी अथवा स्वयं को विद्वान मानने वाला, दूसरे लोगों पर रहम तो कर सकता है लेकिन सच्चा प्रेम नहीं कर सकता| क्योंकि प्रेम में अक्सर स्वयं को दूसरे से छोटा मानने की भी आवश्यकता होती है|
वैसे सच्चा ज्ञान अपने मस्तिष्क में सूचनाओं को संग्रहीत करना नहीं होता, जैसा बहुत से लोग आजकल मानते हैं| कहा जाता है कि ‘ज्ञान मुक्त करता है’ ज्ञान मनुष्य में डर पैदा नहीं करता| किसी परिस्थिति का सामना करने का धैर्य और सुविचारित समाधान ज्ञान के बल पर प्राप्त किया जा सकता है| वैसे विपरीत परिस्थितियों में सच्चा ज्ञान और प्रेम द्वारा पैदा हुआ विश्वास, दोनों ही काम आते हैं| इसलिए सच्चे ज्ञान और प्रेम का संतुलन जीवन में आवश्यक है|
स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी के गीत की पंक्तियाँ याद आ रही हैं-
जो तुझ में है, वो सब में है,
जो सब में है वो तुझ में है|
इसलिए प्रेम को धर्म बना,
इसलिए धर्म को प्रेम बना|
इसी प्रकार प्रेम की एक और उत्कृष्ट अभिव्यक्ति, मुकेश जी की गाई इन गीत पंक्तियों में है-
तुम जो हमारे मीत न होते,
गीत ये मेरे गीत न होते,
खुश होके तुम जो ये
रंग न भरते, ख्वाब ये मेरे ख्वाब न होते|
तुम जो न सुनते, क्यों गाता मैं,
दर्द से घुटके रह जाता मैं!
ऐसे ही आज मन हुआ कि कुछ अलग तरह की बात की जाए, एक विद्वान होने के नाते नहीं, एक मानवीय अभिव्यक्ति के रूप में|
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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