ग़म-ए-ज़िंदगी निबाहें!

ये रुके रुके से आँसू ये दबी दबी सी आहें,

यूँही कब तलक ख़ुदाया ग़म-ए-ज़िंदगी निबाहें|

मजरूह सुल्तानपुरी

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