आज एक बार मैंहिन्दी गीत के एक अमर हस्ताक्षर तथा मेरे अत्यंत प्रिय कवि स्वर्गीय किशन सरोज जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|
किशन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
आज प्रस्तुत है स्वर्गीय किशन सरोज जी का यह नवगीत-

दूर तक फैला नदी का पाट, नावें थक गयीं
शाल वॄक्षोँ से लिपटकर,
शीश धुनती–-सी हवाएं
बादलों के केश, मुख पर
डाल, सोयी–-सी दिशायें
धुन्ध की जुडने लगी फिर हाट, नावें थक गयीँ
मोह में जिसका धरा तन
हो सका अपना न वह जल
देह–मन गीले किये, पर
पास रूक पाया न दो पल
घूमते इस घाट से उस घाट, नावें थक गयीँ
टूटकर हर दिन ढहा
तटबन्ध—सा सम्बन्ध कोई
दीप बन हर रात
डूबी धार में सौगन्ध कोई
देखता है कौन किसकी बाट, नावें थक गयीँ
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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