धूप है ज़्यादा, कम है छाया!

आज एक बार फिर से मैं अपने समय के प्रसिद्ध हिन्दी गीतकार स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|

अवस्थी जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमानाथ अवस्थी जी का यह गीत –

 धूप है ज़्यादा, कम है छाया
           आख़िर यह मौसम भी आया !

टूट चुका है नींद का जादू, कोई सपना साथ नहीं है,
कहने को तो है बहुतेरा, वैसे कोई बात नहीं है !
           सारी रात रहा खुलता जो,
           सुबह वही घूँघट शरमाया !

धुँधली हैं तारों की गलियाँ, पाप के रस्ते चमकीले हैं,
काँटे हैं वैसे के वैसे, फूलों के चेहरे पीले हैं !
           ख़ुशबू भटके मारी-मारी
           मधुवन का है अंग लजाया !

साँझ के दरवाज़े तक हमको, छोड़ गई हैं दिन की राहें,
बस्ती के ऊपर फैली हैं, साँपों जैसी काली बाँहें !
           मौत के रंग से ज़्यादा गहरा,
           उजले इनसानों का साया !

गीत के सौदे करने वाले, दर्द की क़ीमत को क्या जानें,
कौन उन्हें जाकर समझाए, बिकते नहीं कभी दीवाने !
           अन्धकार के रंगमहल में,
           कब कोई सूरज सो पाया ।

तेज़ बहुत हैं वक़्त के पहिए, अब रुकने की बात करें क्या,
राह में क्या कुछ टूटा-फूटा, सोच इसे अब आँख भरें क्या ?
           आओ अब सामान सम्भालें,
           देर हुई यह शहर पराया !

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

                                   ********   

2 responses to “धूप है ज़्यादा, कम है छाया!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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