तुम बाज़ार के बीच!

दिल सी चीज़ के गाहक होंगे दो या एक हज़ार के बीच,

‘इंशा’ जी क्या माल लिए बैठे हो तुम बाज़ार के बीच|

इब्न-ए-इंशा

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