तो चश्म-ए-सुब्ह में!

सबा से करते हैं ग़ुर्बत-नसीब ज़िक्र-ए-वतन,

तो चश्म-ए-सुब्ह में आँसू उभरने लगते हैं|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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