होंठों तक आया कई बार!  

आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ नवगीतकार स्वर्गीय कुमार शिव जी  का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|

इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय कुमार शिव जी का यह नवगीत –

होंठों तक आया कई बार
वाणी तक पहुँच नहीं पाया
वो हुआ कभी भी नहीं व्यक्त !

मेरे मन में जितना कुछ था
वह बिना सुने ही चला गया
अब घिरा बैंगनी सन्नाटा
चुप्पी ने पाया अर्थ नया

यादें पीली हैं बेशुमार
अँजुरी में समा नहीं पाया
सूखी रेती-सा झरा वक़्त ।
 
पीड़ा बिछोह की महक रही
दुख के पत्ते हो रहे हरे
मौसम के कुछ नीले निशान
नदिया के होंठों पर उभरे

आवेगयुक्त वो आलिंगन
उन्मीलित पलकें सीपों-सी
नस-नस में उबला हुआ रक्त ।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

                                   ********   

2 responses to “होंठों तक आया कई बार!  ”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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