कितनी ख़ुशलफ़्ज़ थी तेरी आवाज़!  

आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ नवगीतकार स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी  की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|

इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी की यह कविता –

कितनी ख़ुशलफ़्ज़ थी तेरी आवाज़
अब सुनाए कोई वही आवाज़।

ढूँढ़ता हूँ मैं आज भी तुझमें
काँपते लब, छुई-मुई आवाज़।

शाम की छत पे कितनी रौशन थी
तेरी आँखों की सुरमई आवाज़।

जिस्म पर लम्स चाँदनी शब का
लिखता रहता था मख़मली आवाज़।

ऎसा सुनते हैं, पहले आती थी
तेरे हँसने की नुक़रई आवाज़।

अब इसी शोर को निचोड़ूँगा
मैं पियूँगा छनी हुई आवाज़।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

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2 responses to “कितनी ख़ुशलफ़्ज़ थी तेरी आवाज़!  ”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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