आज एक बार फिर मैं अपने ज़माने में काव्य मंचों के एक लोकप्रिय कवि/शायर रहे स्वर्गीय से बेकल उत्साही जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ|
बेकल जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बेकल उत्साही जी की यह ग़ज़ल –

हम को यूँ ही प्यासा छोड़
सामने चढ़ता दरिया छोड़
जीवन का क्या करना मोल
महंगा ले-ले, सस्ता छोड़
अपने बिखरे रूप समेट
अब टूटा आईना छोड़
चलने वाले रौंद न दें
बीच डगर में रुकना छोड़
हो जाएगा छोटा क़द
ऊँचाई पर चढ़ना छोड़
हमने चलना सीख लिया
यार, हमारा रस्ता छोड़
ग़ज़लें सब आसेबी हैं
तनहाई में पढ़ना छोड़
दीवानों का हाल न पूछ
बाहर आजा परदा छोड़
बेकल अपने गाँव में बैठ
शहरों-शहरों बिकना छोड़
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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