जी को दुखाना क्या!

उन से बहार ओ बाग़ की बातें कर के जी को दुखाना क्या,

जिन को एक ज़माना गुज़रा कुंज-ए-क़फ़स में राम हुए|

इब्न-ए-इंशा

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