हर्फ़ शनासाई का!

दौलत-ए-लब से फिर ऐ ख़ुसरव-ए-शीरीं-दहनाँ,

आज अर्ज़ां हो कोई हर्फ़ शनासाई का|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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