ज़ेहन ज़ेहन तारी है!

हाल ख़ूँ में डूबा है कल न जाने क्या होगा,

अब ये ख़ौफ़-ए-मुस्तक़बिल ज़ेहन ज़ेहन तारी है|

मंज़र भोपाली

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