बढ़ के इक दिन उसी!

जिस पे होता ही नहीं ख़ून-ए-दो-आलम साबित,

बढ़ के इक दिन उसी गर्दन में हमाइल* हो जाओ|

*झूल जाओ

इरफ़ान सिद्दीक़ी

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