कूज़ा-ए-कुहन में रहे!

ये हुक्म है रहे मुट्ठी में बंद सैल-ए-नसीम,

ये ज़िद है बहर-ए-तपाँ कूज़ा-ए-कुहन में रहे|

मजरूह सुल्तानपुरी

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