जिसे समझ में आ सके

इज्ज़*से और बढ़ गई बरहमी-ए-मिज़ाज**-ए-दोस्त,

अब वो करे इलाज-ए-दोस्त जिस की समझ में आ सके|

*बेबसी, नाराजगी

हफ़ीज़ जालंधरी

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