हम न अगर सुना सके!

तुम ही न सुन सके अगर क़िस्सा-ए-ग़म सुनेगा कौन,

किस की ज़बाँ खुलेगी फिर हम न अगर सुना सके|

हफ़ीज़ जालंधरी

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