रवींद्र से!

आज एक बार फिर मैं हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं में अपना अमूल्य योगदान करने वाले तथा धर्मयुग पत्रिका के यशस्वी संपादक रहे स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ|

भारती जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की यह रचना –

[रवीन्द्र जन्मशताब्दी के वर्ष : सोनारतरी (सोने की नाव) तथा उनकी अन्य कई प्यारी कविताएँ पढ़कर]

नहीं नहीं कभी नहीं थी, कोई नौका सोने की !

सिर्फ दूर तक थी बालू, सिर्फ दूर तक अँधियारा
वह थी क्या अपनी ही प्यास, कहा था जिसे जलधारा ?
नहीं दिखा कोई भी पाल, नहीं उठी कोई पतवार
नहीं तट लगी कोई नाव, हमने हर शाम पुकारा
अर्थहीन निकला वह गीत
शब्दों में हम हुए व्यतीत
हमने भी क्या कीमत दी यों विश्वासी होने की !
नहीं नहीं कभी नहीं थी
कोई नौका सोने की
हमको लेने कब आया कोई भी चन्दन का रथ ?

हमने भी अनमने उदाल धूल में लिखे अपने नाम
हमने भी भेजे सन्देश उड़ते बादल वाली शाम
जाग-जाग वातायन से देखी आगन्तुक की राह
हाय क्या अजब थी वह प्यास, हाय हुआ पर क्या अंजाम
लगते ही जरा कहीं आँच
निकला हर मणि-दाना काँच
शेष रहे लुटे थके हम, शेष वही अन्तहीन पथ
हमको लेने कब आया
कोई भी चन्दन का रथ ?

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

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3 responses to “रवींद्र से!”

  1. सुनहरा बजरा
    सुबह आसमान में उगता है
    वह स्वप्न के अँधेरे से उभरती है
    रेगिस्तान भी हरी घास की खुशबू जानता है
    टीलों के नीचे
    वे जीवन का संचय करते हैं
    गर्म रेत में हवा के माध्यम से गाने गाते हुए
    शांति का हर शब्द एक प्रेमपूर्ण प्रतिरूप चाहता है
    हर चीज़ में ईश्वर को देखने में विश्वास दोपहर की गर्मी और प्यास पर काबू पाने में मदद करता है
    पाल रात में अर्धचंद्र में खुलता है
    जीवन की शाम में, जैसे सूरज रात में ढल जाता है, सुनहरा बजरा, आत्मा, हमें वापस शून्य में ले जाती है

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  2. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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