थके-माँदे मुसाफ़िर ज़ुल्मत-ए-शाम-ए-ग़रीबाँ में,
बहार-ए-जल्वा-ए-सुब्ह-ए-वतन को याद करते हैं|
चकबस्त ब्रिज नारायण
A sky full of cotton beads like clouds
थके-माँदे मुसाफ़िर ज़ुल्मत-ए-शाम-ए-ग़रीबाँ में,
बहार-ए-जल्वा-ए-सुब्ह-ए-वतन को याद करते हैं|
चकबस्त ब्रिज नारायण
Leave a comment