ज़बाँ से याद करते हैं!

जनाब-ए-शैख़ को ये मश्क़ है याद-ए-इलाही की,

ख़बर होती नहीं दिल को ज़बाँ से याद करते हैं|

चकबस्त ब्रिज नारायण

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