दे दे इस साहसी अकेले को!

अज्ञेय जी द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के क्रम में आज मैं स्वर्गीय विजयदेव नारायण साही जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|

इनकी एक ही रचना मैंने पहले शेयर की है|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय विजयदेव नारायण साही जी की यह कविता –

दे दे रे
दे दे इस साहसी अकेले को
एक बूंद।

ओ सन्ध्या
ओ फ़कीर चिड़िया
ओ रुकी हुई हवा
ओ क्रमशः तर होती हुई जाड़े की नर्मी
ओ आस पास झाड़ों झंखाड़ों पर बैठ रही आत्मीयता

कैसे ? इस धूसर परिक्षण में पंख खोल
कैसे जिया जाता है ?
कैसे सब हार त्याग
बार-बार जीवन से स्वत्व लिया जाता है ?
कैसे, किस अमृत से
सूखते कपाटों को चीर चीर
मन को निर्बन्ध किया जाता है ?

दे दे इस साहसी अकेले को।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

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2 responses to “दे दे इस साहसी अकेले को!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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