अज्ञेय जी द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के क्रम में आज मैं स्वर्गीय मदन वात्स्यायन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|
इनकी एक ही रचना मैंने पहले शेयर की है|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय मदन वात्स्यायन जी की यह कविता –

नए दूल्हे-सा सूरज, नववधू सा पीछे-पीछे यह
शुक्रतारा जा रहा है ।
बदल रहा है रंग आसमाँ का क्षण-क्षण
बदल-बदल यह जगमगा रहा है ।
इंजन के हेडलाइट-सा ; शोरगुल के बीच
सूरज निकल गया ।
गार्ड की रोशनी-सा पीछे पीछे गुमसुम अब
शुक्रतारा जा रहा है ।
हमारी बस्ती में दिये-से, बल्ब-से (पैट्रोमैक्स-सा चाँद),
चारों ओर बल उठे तारे ।
दूरी में बैलगाड़ी की लालटेन-सा यह
शुक्रतारा जा रहा है ।
शहर को अँधेरा कर हवाई जहाज़ से
मिनिस्टर चले गए ।
’जनता’ से एम० एल० ए०-सा पीछे-पीछे यह
शुक्रतारा जा रहा है ।
कि भटक न जाएँ, राहगीरों की ख़ातिर
शाम को जला के मशाल अब शुक्रतारा जा रहा है ।
तपता सूर्य गया चिल्लाते ’राह दिखाते’ कौड़ियों-से
सितारे दौड़ आ भरे ।
अपने सब कुछ की रमाने धूनी अब क्रान्ति-दृष्टा
शुक्रतारा जा रहा है ।
है नेहरू एक वतन का प्यारा सताए हुओं को है
जिस पर भरोसा ।
हमारा आँखों में अब भी चमक है कि बीच आसमाँ में
वह सितारा जगमगा रहा है ।
बीवी, सजा दियों का थाल लाओ, ज्योति भर लो ।
कि हमारे आसमान को सूना कर के रश्के देवता यह
शुक्रतारा जा रहा है ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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