सागर तट!

आज एक बार फिर मैं हिन्दी में कवियों के कवि कहलाने वाले स्वर्गीय शमशेर बहादुर सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|

शमशेर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत कर रहा हूँ स्वर्गीय शमशेर बहादुर सिंह जी की यह कविता

यह समन्दर की पछाड़
          तोड़ती है हाड़ तट का –
          अति कठोर पहाड़।
 
पी गया हूँ दृश्‍य वर्षा का :
हर्ष बादल का
हृदय में भर कर हुआ हूँ हवा-सा हलका।

धुन रही थीं सर
व्‍यर्थ व्‍याकुल मत्त लहरें
वहीं आ-आकर
जहाँ था मैं खड़ा
मौन;
समय के आघात से पोली, खड़ी दीवारें
जिस तरह घहरें
एक के बाद एक, सहसा।

चाँदनी की उँगलियाँ चंचल
क्रोशिये से बुन रही थीं चपल
फेन-झालर बेल, मानो।
पंक्तियों में टूटती-गिरती
चाँदनी में लोटती लहरें
बिजलियों-सी कौंदती लहरें
मछलियों-सी बिछल पड़तीं तड़पती लहरें
बार-बार।
 
स्‍वप्‍न में रौंदी हुई-सी विकल सिकता
पु‍तलियों-सी मूँद लेती
आँख।

         यह समन्दर की पछाड़
          तोड़ती है हाड़ तट का —
          अति कठोर पहाड़।
          यह समन्दर की पछाड़

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

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