ज़बाँ पत्थर पे रक्खी थी!

तुम्हारे नाम पर मैंने हर आफ़त सर पे रक्खी थी,

नज़र शो’लों पे रक्खी थी ज़बाँ पत्थर पे रक्खी थी|

राहत इंदौरी

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