आज एक बार फिर मैं हिन्दी के एक प्रतिष्ठित कवि स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| दुष्यंत जी को उनके द्वारा आपातकाल में लिखी गई ग़ज़लों के संग्रह ‘साये में धूप’ के लिए विशेष ख्याति मिली थी|
दुष्यंत जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत कर रहा हूँ स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की यह कविता –

मेरी कुंठा
रेशम के कीड़ों-सी
ताने-बाने बुनती,
तड़प तड़पकर
बाहर आने को सिर धुनती,
स्वर से
शब्दों से
भावों से
औ’ वाणी से कहती-सुनती,
गर्भवती है
मेरी कुंठा –- कुँवारी कुंती!
बाहर आने दूँ
तो लोक-लाज मर्यादा
भीतर रहने दूँ
तो घुटन, सहन से ज़्यादा,
मेरा यह व्यक्तित्व
सिमटने पर आमादा।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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