पूर्व स्मृति!

आज एक बार फिर से मैं हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं में अपना अमूल्य योगदान करने वाले स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|

अज्ञेय जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत कर रहा हूँ स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की यह कविता

पहले भी मैं इसी राह से जा कर फिर-फिर हूँ आया-
किन्तु झलकती थी इस में तब मधु की मन-मोहक माया!
हरित-छटामय-विटप-राजि पर विलुलित थे पलाश के फूल-
मादकता-सी भरी हुई थी मलयानिल में परिमल धूल!

पागल-सी भटकी फिरती थी वन में भौंरों की गुंजार,
मानो पुष्पों से कहती हो, ‘मधुमय है मधु का संसार!’
कुंजों में तू छिपती फिरती-करती सरिता-सी कल्लोल,
व्यंग्य-भाव से मुझ से कहती, ‘क्या दोगे फूलों का मोल?’
हँस-हँस कर तू थी खिल जाती सुन कर मेरी करुण पुकार-

‘मायाविनि! मरीचिका है यह, या छलना, या तेरा प्यार?’
कई बार मैं इसी राह से जा फिर-फिर हूँ आया-
किन्तु झलकती थी इस में तब मधु की मन-मोहक माया!
चला जा रहा हूँ इस पथ से ले निज मूक व्यथा उद्भ्रान्त,

किन्तु आज छाया है इस पर नीरव-सा नीरस एकान्त!
पुष्पच्छटा-विहीन खड़े रोते-से लखते हैं तरुवर-
पीड़ा की उच्छ्वासों-सी कँपती हैं शाखाएँ सरसर!
बीता मधु, भूला मधु-गायन बिखरी भौंरों की गुंजार;
दबा हुआ सूने में फिरता वन-विहगों का हाहाकार!

अन्तस्तल में मीठा-मीठा गूँज रहा तेरा उपहास-
मानव-मरु में कहाँ छिपाऊँ मैं अपने प्राणों की प्यास?
कई बार मैं इसी राह से जा कर फिर-फिर हूँ आया-
किन्तु कहाँ इस में पाऊँ वह मधु की मन-मोहक माया!

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

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