रंग जमा के रह गईं!

फिर हैं वही उदासियाँ फिर वही सूनी काएनात,

अहल-ए-तरब* की महफ़िलें रंग जमा के रह गईं|

*मज़ा करने वालों

फ़िराक़ गोरखपुरी

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