आग लगा के रह गईं!

कौन सुकून दे सका ग़म-ज़दगान-ए-इश्क़ को,

भीगती रातें भी ‘फ़िराक़’ आग लगा के रह गईं| 

फ़िराक़ गोरखपुरी

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