शाने हिला के रह गईं!

उफ़ ये ज़मीं की गर्दिशें आह ये ग़म की ठोकरें,

ये भी तो बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता* के शाने हिला के रह गईं|

*दुर्भाग्य

फ़िराक़ गोरखपुरी

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