उषस् (चार)!

आज एक बार फिर मैं हिन्दी के एक प्रमुख कवि स्वर्गीय नरेश मेहता

 जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सुबह होने की घटना ऐसी है जो निरंतर होती रहती है लेकिन अत्यंत दिव्य है| नरेश मेहता जी ने इस दिव्य घटना से प्रेरित होकर ‘उषस्’ शीर्षक सेचार रचनाएं लिखी हैं, जिनमें से यह चौथी है|

मेहता जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत कर रहा हूँ स्वर्गीय नरेश मेहता जी की यह कविता

किरणमयी ! तुम स्वर्ण-वेश में

स्वर्ण-देश में !!

सिंचित है केसर के जल से
इन्द्रलोक की सीमा
आने दो सैन्धव घोड़ों का
रथ कुछ हल्के-धीमा,
पूषा के नभ के मन्दिर में
वरुणदेव को नींद आ रही
आज अलकनन्दा
किरणों की वंशी का संगीत गा रही
अभी निशा का छन्द शेष है अलसाये नभ के प्रदेश में !!

विजन घाटियों में अब भी
तम सोया होगा फैला कर पर
तृषित कण्ठ ले मेघों के शिशु
उतरे आज विपाशा-तट पर

शुक्र-लोक के नीचे ही
मेरी धरती का गगन-लोक है
पृथिवी की सीता-बाँहों में
फसलों का संगीत लोक है
नभ-गंगा की छाँह, ओस का उत्सव रचती दूब देश में !!

नभ से उतरो कल्याणी किरनो !
गिरि, वन-उपवन में
कंचन से भर दो बाली-मुख
रस, ऋतु मानव-मन में
सदा तुम्हारा कंचन-रथ यह
ऋतुओं के संग आये
अनागता ! यह क्षितिज हमारा
भिनसारा नित गाये
रैन-डूँगरी उतर गये सप्तर्षी अपने वरुण-देश में !!

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

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One response to “उषस् (चार)!”

  1. christinenovalarue avatar
    christinenovalarue

    🧡

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