चाहना जागी लगे खाँचा बनाने!

आज मैं हिन्दी नवगीत विधा के एक प्रमुख हस्ताक्षर स्वर्गीय नईम जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|

नईम जी के कुछ नवगीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत कर रहा हूँ स्वर्गीय नईम जी का यह नवगीत

चाहना जागी लगे खाँचा बनाने-
समय श्रम। दोनों लगे साँचा बनाने।

चाहता हूँ ढालना अनुभूतियों को
और प्राणों में बसे कुछ मोतियों को।
रूप, रंग, आकार की क्यों फ़िक्र पालूँ
चाहते हैं लोग असली ज्योतियों को।

सागरोमीना रहें गर सामने तो,
हम बहुत हैं। होश अपने थामने को-
मीरो ग़ालिब, निरालाओं से कहूँ क्या?
ज़माना आगे पड़ा है साधने को।

आज भाषा को मिला है समय गढ़ने,
चले हैं अक्षर हमें ये आज पढ़ने।
हम उन्हें वो बाँचने में लगे हमको-
प्रयासों से सीढ़ियाँ हम आज चढ़ने।

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

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