ख़ाक उड़ा के रह गईं!

तेरे ख़िराम-ए-नाज़* से आज वहाँ चमन खिले,

फ़सलें बहार की जहाँ ख़ाक उड़ा के रह गईं|

*मतवाली चाल

फ़िराक़ गोरखपुरी

Leave a comment