A sky full of cotton beads like clouds
मुझ को ख़राब कर गईं नीम-निगाहियाँ* तिरी,
मुझ से हयात ओ मौत भी आँखें चुरा के रह गईं|
*चितवन
फ़िराक़ गोरखपुरी
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