न जाने हम कहाँ होंगे!

हमारे बा‘द अब महफ़िल में अफ़्साने बयाँ होंगे,

बहारें हम को ढूँढेगी न जाने हम कहाँ होंगे|

मजरूह सुल्तानपुरी

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