आँखों में रेत प्यास!

आज मैं अपने एक अग्रज और हिन्दी नवगीत को प्रतिष्ठा दिलाने में एक अग्रणी भूमिका निभाने वाले स्वर्गीय देवेन्द्र शर्मा इन्द्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|

स्वर्गीय इन्द्र जी से मुझे बहुत स्नेह प्राप्त हुआ था और मैं सामान्यतः जो मेरे अधिक निकट रहे हैं उनकी रचनाएं शेयर नहीं करता हूँ|

लीजिए आज प्रस्तुत कर रहा हूँ स्वर्गीय देवेन्द्र शर्मा इन्द्र जी का यह नवगीत

फूलों के बिस्तर पर
नींद क्यों नहीं आती,
चलो, कहीं सूली पर, सेज हम बिछाएँ ।

दूर-दूर तक कोई
नदी नहीं दिखती है ।
हिरणों की आँखों में
रेत प्यास लिखती है ।
घाटी में हँसते हैं,
बुत ही बुत पत्थर के,
चलो, कहीं सूने में, ख़ुद से बतियाएँ ।

आग हुई धुआँ-धुआँ
अँधियारा गहराया ।
पेड़ों पर पसर गया
गाढ़ा काला साया ।
आगे है मोड़ों पर
बियाबान सन्नाटा
चलो, कहीं पिछली पगडण्डी गुहराएँ ।

तुम से जो मुमकिन था
अभिनय वह ख़ूब किया ।
वह देखो सूर्यध्वज
जुगनू ने थाम लिया ।
मंच पर उभरने को
एक भीड़ आतुर है,
चलो, कहीं पर्दे के पीछे छिप जाएँ ।

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

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