आषाढ़ का पहला दिवस!

आज फिर से मैं, अपने समय में मंचों के विशिष्ट कवि रहे स्वर्गीय शिवमंगल सिंह सुमन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सुमन जी की ये पंक्तियाँ हमारे पूर्व प्रधानमंत्री और स्वयं अच्छे कवि रहे स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी अक्सर दोहराते थे-

हार में या जीत में, किंचित नहीं भयभीत मैं,

संघर्ष पथ पर जो मिला, ये भी सही, वो भी सही|

सुमन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शिशुमंगल सिंह ‘सुमन जी की यह कविता

करता विवश
उमड़ी घटा को देखकर
चूमूँ लहराते केश को
पी लूँ तपन, सीझूँ सपन
गदरा उठूँ
इतरा उठूँ
पातीम्बरी आकाश में
उलझी हुई
नीलाम्बरी के छोर-सा,
टपकूँ निबौरी-सा निपट
थिरकूँ विसुध वन-मोर-सा,
बौछार के उल्लास में
सोंधी धारा की गंध को
पी लूँ तृषित गजराज-सा
झूमूँ सहज
हर सल्लकी औ’ शाल की
मदविह्वला नत डाल पर
निर्व्याज-सा
झपटूँ शिकारी बाज बन
जर्जर व्यवस्था के जलपते गिद्ध पर
कर विद्ध ख़ूनी चंचु
पंजे तोड़ पैने
जीर्ण डैने ध्वस्त कर
दूँ मुक्त कर आकाश
हंसों औ’ बगुलियों के लिए
नवगर्भ-धारण के
अमित आयाम में,
गोरी छलकती
रस-कलश में भीजती
बिछुए बजाती झींगुरों के
चल पड़े उस गौल पर
जिसकी हुमसती ओट ही में
धुकधुकी साधे
कहीं दुबकी खड़ी हो
नटखटी गोपाल की,
हर प्रात में
गोपाल से पहले उठे
हलधर हठी
जोते धरा की पीर को
उस नीर के आह्वान में
जो लहलहाए
लू-लपट में झुलसते इन्सान को
चूनर उड़ाती, खिलखिलाती
झूमती फसलें
छितिज के छोर से
उठती दिखेँ
लुटती दिखें बौछार के हर तार में
द्यावा-धरा की प्रीति की
घुमड़न समेटे स्रोत-सा
अल्हड़ छयल
उद्ग्रीव कजरारे दृगों को चूमता
बरबस बढ़ जाता हवस

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

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