आज एक बार फिर से मैं, अपनी अलग किस्म की रचनाओं के माध्यम से किसी समय हिन्दी काव्य मंचों पर धूम मचाने वाले स्वर्गीय शिशुपाल सिंह ‘निर्धन’ जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| निर्धन जी की प्रसिद्ध पंक्तियाँ हैं-

एक पुराने दुख ने पूछा, क्या तुम अभी वहीं रहते हो,
उत्तर दिया चले मत आना, मैंने वो घर बदल लिया है|
निर्धन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शिशुपाल सिंह ‘निर्धन’ जी का यह गीत –
माटी के लाल हम,भारत के भाल हम
हम हैं रहबईया, भईया गाँव के,
हम हैं रहबईया, भईया गाँव के,
धूल भरी संध्या तो फूल भरे प्रात हैं
शीश पे करोड़ दीनवंधू के हाथ हैं
सुन्दर चरित्र-चित्र धरती पवित्र है
चिन्ह मिलत नाहीं यहाँ,पापियन के पाँव के
हम हैं रहबईया भइया…
जन्म से फटी है यहाँ पैर बो-बिबाई
राम कसम जानत हैं पीर हम पराई
सुख से हैं दूर और श्रम से चूर-चूर हम
तन हैं रंगे सबके भईया सूरज की घाम के
हम हैं रहबईया भईया…
माटी के कण-कण में अपना इतिहास है
फूंस की मढ़ईया दिया माटी का पास है
सागर के सीप हम , महलों के दीप हम
हम हैं बैठईया भईया बरगद की छाँव के
हम हैं रहबईया भईया…
बादल के संग फीरे अंकुर की आशा
छेद रही अम्बर को अवनी की आशा
धरती सी दूरी, बादल से रसिया
मिलजुलके गीत लिखें फसलों के नाम के
हम हैं रहबईया भईया…
गोरे-गोरे,गात-गात गीत जहां गोरी
अमुवा की डार परी रेशम की डोरी
प्रियतम की पाती के कौन पढ़े आखर
समझत हैं अर्थ गोरी कागा की काँव के
हम हैं रहबईया भईया…
माटी के लाल हम,भारत के भाल हम
हम हैं रहबईया , भईया गाँव के,
हम हैं रहबईया , भईया गाँव के.
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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