आज मैं हिन्दी के प्रसिद्ध व्यंग्यकार स्वर्गीय रवीन्द्रनाथ त्यागी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| त्यागी जी ने व्यंग्य लेखन के क्षेत्र में तो विशेष ख्याति प्राप्त की ही थी, उन्होंने बहुत सी सुंदर कविताएं भी लिखी थीं|
त्यागी जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रवीन्द्रनाथ त्यागी जी की यह कविता –

धीरे-धीरे सांझ हो गई
अब बेला के फूल हिल गए
नभ में जमा भाव वह नए,
जगभर को मृदु स्वप्न दे गई!
ग्राम डगर पर खिसका अंचल
स्वर्ण विहग ले सोता पीपल
उठ जल से वह रेखा चंचल
अभी-अभी नभ में खो गई!
उधर सो गया धीरे, सविता
नभ में फैला कोमल कविता
जो बिखरे बादल की संध्या
नीरव पग धर मुझे दे गई!
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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