अश्रु आचमन!

आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|

रंजक जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत

अगर शपथ की परिधि न होती
मेरी पीर
कथा हो जाती

पिंजरे का पंछी भर रहना
तो मुझको स्वीकार नहीं था
परवशता ने झुका दिया सिर
क्योंकि अन्य उपचार नहीं था

अगर तोड़ देता ये बन्धन
जग के लिए
प्रथा हो जाती

दर्द बिना जीना क्या जीना
दर्द बिना जीवन मरुथल है
दर्द अकेलेपन का स्वर है
दर्द स्नेह का गंगाजल है

प्यास, अश्रु आचमन न करती
तो हर सांस
वृथा हो जाती

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

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