आज एक बार फिर से मैं अपनी तरह के एक अनोखे कवि स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|
भवानी दादा बातचीत के लहज़े में बहुत सहज रूप से गहरी बात कह देते थे| भवानी दादा की बहुत सी कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की यह कविता –

कोई अलौकिक ही
कला हो किसी के पास
तो अलग बात है
नहीं तो साधारणतया
कलाकार को तो
लौकिक का ही सहारा है
लौकिक के सहारे
लोकोपयोगी रचना ही
करनी है
और ऐसा करते-करते
जितनी अलौकिकता आ जाए
उतनी अपने भीतर भरनी है
कई लोग
लोगों को किसी
खाई की तरफ़ ले जाएँ
ऐसी कुछ चीज़ें
अलौकिक कला कहकर
रचते हैं
मगर इस तरह
न लोक बचता है
न वे बचते हैं
सब कुछ विकृत
होता है
उनकी कृतियों से
ख़ुद भी मरते-मरते
भयभीत होते हैं वे
अपनी रचना की स्मृतियों से !
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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