आज एक बार फिर से मैं श्रेष्ठ कवि श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|
मिश्र जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत –

काट लेना पेड़ बरगद का ख़ुशी से
नाश या निर्माण कर, अधिकार तेरा ।
तू चला बेशक कुल्हाड़ी, किन्तु पहले
पाखियों को ढूंढ़ने तो दे बसेरा ।
है नशे में धुत्त, न जानेगा कभी तू
यह अहं तलवार का कितना बुरा है
तू न संगत में रहा कवि की, इसी से
यार, तेरा लफ़्ज इतना ख़ुरदुरा है
रात के अंतिम पहर तक जागता जो
सांझ ही उस कौम का होता सबेरा ।
देख तूने भी लिया है बाज होकर
बाज होना : काटना ख़ुद को अकेले ।
अब जरा मेरी तरह तू बन कबूतर
और फिर तू झेल दुनिया के झमेले
इक गुटरगूँ प्यार का तू बोल प्यारे
मुस्करा कर काट दे गम का अंधेरा ।
जानता मैं भी कि चैती के दिनों में
तोड़ देना बांध को कितना सरल है
किन्तु जब बहने लगेंगे बाढ़ में घर
तब समझना यह नदी कितनी प्रबल है ।
रंग भरना सीख पहले ज़िन्दगी से
तब कहीं जाकर कभी बनना चितेरा ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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