सौंदर्य-बोध!

आज एक बार फिर से मैं साहित्य की लगभग सभी विधाओं में योगदान करने वाले प्रमुख साहित्यकार एवं कवि श्री रामदरश मिश्र  जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|

मिश्र जी की बहुत सी कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र  जी की यह कविता

सौंदर्य-बोध
मानव-मन की सबसे बड़ी नियामत है
कलाएँ विविध प्रकार से
इसी को सहेजती रहती हैं
परंतु क्या विडंबना है
कि अपढ़ गँवार श्रमजीवी
रोटी-बोध तक सीमित रह जाते हैं,
मेरा मकान बन रहा है,
बनारहा है एक अपढ़ गँवार मिस्त्री
अब बरामदे में फर्श तैयार होनी थी
मैं एक दिन के लिए बाहर चला गया
लौट कर आया तो देखा
फर्श पर उगते हुए सूर्य का चित्र उकेरा गया है
लाल-लाल आभा सेदीप्त
अरे वाह, क्या बात है
मुझे लगा कि
घरों में जागृति का छंद गूँज रहा है
सरोवरों में कमल खिल गए हैं
राहें बज रही हैं, पगध्वनियों से
और डाल-डाल पर पंछी चहचहा रहे हैं।

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

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