लिए ग़ुबार चले!

न जाने कौन सी मिट्टी वतन की मिट्टी थी,

नज़र में धूल जिगर में लिए ग़ुबार चले|

गुलज़ार

One response to “लिए ग़ुबार चले!”

  1. 👋

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