मान भी लूँ !

श्रेष्ठ कवियों की कविताएं शेयर करने के क्रम में मैं अभी अज्ञेय जी द्वारा संपादित सप्तकों में शामिल श्रेष्ठ कवियों की कविताएं शेयर कर रहा हूँ और इसके अंतर्गत आज मैं चौथा सप्तक में शामिल एक कवि श्री नंदकिशोर आचार्य जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री नंदकिशोर आचार्य जी की यह कविता

मान भी लूँ
कि पाप ने मुझे ही डँसा
तो तुम्हें क्या हो गया था
जब वह मेरी ओर आ रहा था ?

मुझे तब ही समझ लेना था
कि तुम क्रूर और घमण्डी हो
और डरपोक भी।
मुझ निरीह से
तुम्हें भला क्या भय था ?

तुम्हारे सब से प्यारे पुत्र का रक्त
जब मुझ पर
छिड़का जाता है
तो कौन होता है पवित्र
मैं ? पाप ? या स्वंय तुम ?

तुम तो पिता हो न !
सच-सच कहो
कैसा लगता है तुम्हें
जब यीशु का रक्त
बूँद-बूँद टपकता है
और तुम्हारा चेहरा और हाथ
अपने ही बेटे के खून से
भीग जाते है !

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार|                                         

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