श्रेष्ठ कवियों की कविताएं शेयर करने के क्रम में मैं अभी अज्ञेय जी द्वारा संपादित सप्तकों में शामिल श्रेष्ठ कवियों की कविताएं शेयर कर रहा हूँ और इसके अंतर्गत आज मैं चौथा सप्तक में शामिल एक कवि स्वर्गीय स्वदेश भारती जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| उन्होंने इस एक ही शीर्षक से की कविताएं लिखी थीं, उनमें से एक यहाँ प्रस्तुत है|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय स्वदेश भारती जी की यह कविता –

सम्बन्धों का छलना मनुष्य को
जीवन में अराजक बना देता है
वह नहीं कर पाता
भले और बुरे का निर्णय
न्याय का अधिकार
मस्तिष्क की प्रवँचना के अन्धेरे तलघर में
दुबककर बैठ जाता है
अन्याय के घटाटोप अन्धकार से आच्छादित करता है ।
ऐसे में व्यक्ति सिर्फ बोलता है
अकमर्णता के कगार से फिसलकर
गहरी खाई में गिरता है
सच्चाई के रंग में विष घोलता है
फिर भी अपने हृदय में
वादा-फ़रोशी के कई रँग मिलाता है
तब उसकी नियति खोट बन जाती है ।
मनुष्य कर्म और अकर्म का पैमाना है
व्यक्ति का समष्टि के प्रति सेवाभाव
बस, एक बहाना है
वह अपनी अनीतिधर्मा नीयत का आजन्म
बिखराव सहता है
उसके लिए मानव धर्म
सिर्फ मानसिक ताना बाना है ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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