रोज़ मुसलमाँ होता है!

फिर उनकी गली में पहुँचेगा फिर सहव का सज्दा कर लेगा,

इस दिल पे भरोसा कौन करे हर रोज़ मुसलमाँ होता है|

इब्न-ए-इंशा

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