आज मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ एक महत्वपूर्ण कवि स्वर्गीय मदन वात्स्यायन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| उनकी रचनाएं मैंने शायद पहले शेयर नहीं की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय मदन वात्स्यायन जी की यह कविता –

मुझे पूरब की एक डायन से मुहब्बत है ।
वह अप्सरा है ; उस का कभी ब्याह नहीं हुआ,
उस के प्राण घर-द्वार की बलिष्ठ वल्गा से निर्बन्ध हैं ।
मुझे पूरब की एक डायन से मुहब्बत है ।
सुबह के प्रकाश में वह अलबेली अरुणाभिसारिका
ख़ाली पैरों चुपके आ कर मेरी खिड़की में झाँकने लगी ।
मुझे पूरब की एक डायन से मुहब्बत है ।
शत-शत सोतों में बह रहा था तकिए से उतर कर मेरी
पत्नी के केशों का अन्धकार,
उस ने सीखचों में हाथ डाल कर उन केशों को ही पकड़ लिया !
मुझे पूरब की एक डायन से मुहब्बत है ।
जब मेरी पत्नी की नींद उचटने लगी तो हरिणी-सी भाग भी खड़ी हुई ।
पुकार कर कहती गई, कल फिर आऊँगी । मैं ठहर पड़ा ।
मुझे पूरब की एक डायन से मुहब्बत है ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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