ए’तिबार कोई तो हो!

किसे ज़िंदगी है अज़ीज़ अब किसे आरज़ू-ए-शब-ए-तरब,

मगर ऐ निगार-ए-वफ़ा तलब तिरा ए’तिबार कोई तो हो|

अहमद फ़राज़

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