आज एक बार फिर मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित सप्तकों में से एक प्रमुख कवि की रचना शेयर कर रहा हूँ| स्वर्गीय केदारनाथ सिंह जी का ‘तीसरा सप्तक’ में शामिल एक नवगीत आज प्रस्तुत है| सिंह जी की इस कविता में गर्मी की दुपहरी का प्रभावी चित्रण किया गया है|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय केदारनाथ सिंह जी का यह नवगीत –

झरने लगे नीम के पत्ते
बढ़ने लगी उदासी मन की,
उड़ने लगी बुझे खेतों से
झुर-झुर सरसों की रंगीनी,
धूसर धूप हुई मन पर ज्यों —
सुधियों की चादर अनबीनी,
दिन के इस सुनसान पहर में
रुक-सी गई प्रगति जीवन की ।
साँस रोक कर खड़े हो गए
लुटे-लुटे-से शीशम उन्मन,
चिलबिल की नंगी बाँहों में
भरने लगा एक खोयापन,
बड़ी हो गई कटु कानों को
‘चुर-मुर’ ध्वनि बाँसों के वन की ।
थक कर ठहर गई दुपहरिया,
रुक कर सहम गई चौबाई,
आँखों के इस वीराने में —
और चमकने लगी रुखाई,
प्रान, आ गए दर्दीले दिन,
बीत गईं रातें ठिठुरन की ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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