दर्द-आश्ना मिलता नहीं!

ग़ाफ़िलों को क्या सुनाऊँ दास्तान-ए-इश्क़-ए-यार,

सुनने वाले मिलते हैं दर्द-आश्ना मिलता नहीं|

अकबर इलाहाबादी

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